24वें विश्व आध्यात्मिक सम्मेलन का समापन

संत राजिन्दर सिंह जी महाराज, अध्यक्ष सावन कृपाल रूहानी मिशन तथा ह्यूमन यूनिटी कॉन्फ्रैंस, की पावन अध्यक्षता में आयोजित 24वें विश्व आध्यात्मिक सम्मेलन (13-20 सितम्बर 2017) में अनेक धार्मिक एवं आध्यात्मिक विभूतियों ने, तथा भारत एवं विश्व के कोने-कोने से आए हज़ारों लोगों ने भाग लिया। प्रतिभागियों का उद्देश्य था वर्तमान विश्व की परिस्थितियों में स्थाई शांति स्थापित करने के तरीकों पर विचार करना।

13 सितम्बर को, सम्मेलन के उद्घाटन सत्र वाले दिन, कृपाल बाग़ में 31वें मुफ़्त मोतियाबिन्द ऑपरेशन शिविर का आयोजन किया गया, जिसमें 2424 भाई-बहनों की आँखों की जाँच की गई तथा उनमें से 1194 लोगों की आँखों मे मोतियाबिन्द पाया गया, जिनमें से अभी तक 1110 लोगों का सफल मोतियाबिन्द ऑपरेशन किया जा चुका है। इसके अलावा इसी दिन कृपाल बाग़ में ही 49वें रक्तदान शिविर का भी आयोजन किया गया, जिसमें 110 भाई-बहनों ने स्वैच्छिक रूप से रक्तदान किया।

20 सितंबर 2017 को सम्मेलन का समापन सत्र संत दर्शन सिंह जी धाम, बुराड़ी, में आयोजित किया गया। इस दिन विश्व भर में ‘अंतर्राष्ट्रीय ध्यान दिवस’ भी मनाया गया, जिसके चलते सम्मेलन के प्रतिभागियों को भी अध्यात्म व ध्यान के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त करने का अवसर मिला। ध्यान को आंतरिक व बाह्य शांति की स्थापना के लिए, प्रभु-प्रेम विकसित करने के लिए, तथा समस्त मानवजाति के प्रति प्रेम व करुणा प्रसारित करने के लिए एक शक्तिशाली साधन के रूप में स्वीकार किया गया।

कार्यक्रम की शुरुआत में आदरणीया माता रीटा जी ने अनेक विदशी भाई-बहनों के साथ गुरुवाणी से ‘सत्गुरु होए दयाल तो सरधा पूरिया’ शब्द का गायन किया। तत्पश्चात्, संत राजिन्दर सिंह जी महाराज ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए फ़र्माया कि 20 सितम्बर को ‘अंतर्राष्ट्रीय ध्यान दिवस’ होने के कारण हमें ध्यान-अभ्यास की ओर ध्यान देना चाहिए, ताकि हम आंतरिक व बाह्य शांति प्राप्त कर सकें। नियमित ध्यान-अभ्यास से हम गहन शांति की अवस्था में पहुँच जाते हैं और अंतर में प्रभु की दिव्य ज्योति व श्रुति के साथ जुड़ जाते हैं। इस आंतरिक शांति की प्राप्ति से हम परिवर्तित हो जाते हैं और दूसरों के साथ हमारा व्यवहार अधिक प्रेमपूर्ण व शांत हो जाता है। इससे फिर बाहरी शांति का प्रसार होता है क्योंकि धीरे-धीरे हमारे परिवार, पास-पड़ोस, समुदाय, देश, व अंततः संपूर्ण विश्व शांत होता चला जाता है।

सम्मेलन को संबोधित करते हुए जगद्गुरु विश्वकर्मा शंकराचार्य स्वामी दिलीप योगीराज जी ने विश्व भर में शांति व एकता का प्रसार करने के संत राजिन्दर सिंह जी महाराज के अथक प्रयासों की भूरि-भूरि सराहना की।

स्वामी संत राम प्रकाश रमन विश्वकर्मा उपशंकराचार्य जी ने उत्साहपूर्वक ध्यान के विभिन्न लाभों पर प्रकाश डाला, कि यह हमारे मन को शांत करता है, तथा व्यक्ति में व विश्व में शांति की स्थापना में सहायता करता है।

स्वामी चिदानंद सरस्वती जी ने अंतर्राष्ट्रीय ध्यान दिवस की स्थापना करने पर संत राजिन्दर सिंह जी महाराज की प्रशंसा की और कहा कि एक शांत विश्व के स्वप्न को सत्य बनाने के लिए ध्यान-अभ्यास एक शक्तिशाली उपाय है।

आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी देवेन्द्रानंद गिरि जी ने अपने संदेश में कहा कि संत राजिन्दर सिंह जी महाराज सभी संतों के सरताज हैं, जो संपूर्ण संसार में प्रेम का संदेश फैला रहे हैं।

जैन धर्म के पूज्य कस्तूर मुनि जी ने अपने संदश में कहा कि इस प्रकार के सम्मेलन हमें यह जानने में सहायता करते हैं कि विश्व में शांति की स्थापना होना कितना अधिक आवश्यक है।

बौद्ध धर्मगुरु लांबा लोबजंग ने अपने संदेश में कहा कि वे भाग्यशाली हैं जो इस सम्मेलन में भाग ले सके हैं जिसमें ध्यान-अभ्यास पर बातचीत की जा रही है और विश्व शांति की स्थापना में इसके महत्वपूर्ण योगदान पर विचार हो रहा है।

अपने संदेश में स्वामी स्वधर्मानंद सरस्वती जी ने कहा कि शांति पाने के लिए हमें नैतिक सद्गुणों को अपने अंदर धारण करना होगा और संत राजिन्दर सिंह जी महाराज जैसे पूर्ण संतों की शिक्षाओं को अपने जीवन में धारण करना होगा।

श्री श्री भगवान आचार्य जी ने कहा कि सावन कृपाल रूहानी मिशन जैसे संगठन विश्व में शांति लाने में सहायता कर सकते हैं, और इसका श्रेय संत राजिन्दर सिंह जी महाराज को जाता है।

डॉ. मौलवी मुफ़्ती मुहम्मद मुकर्रम अहमद जी ने ऐसे अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों का आयोजन करने के लिए संत राजिन्दर सिंह जी महाराज की प्रशंसा की जिनके द्वारा आज के तनावयुक्त माहौल में शांति व एकता स्थापित करने पर ज़ोर दिया जाता है।

गोष्ठी के अंत में फ़ादर बेन्टो रॉडरिगेज़ द्वारा सम्मेलन का घोषणा-पत्र पढ़ा गया, जिसमें यह प्रस्ताव पास किया गया कि ध्यान ही वो शक्तिशाली साधन है जो आज के तनाव भरे माहौल को शांत करके संपूर्ण विश्व को परिवर्तित कर सकता है। यह माना गया कि ध्यान हमें प्रभु की आंतरिक ज्योति व श्रुति के संपर्क में लाता है तथा अभ्यर्थी को गहन शांति से भरपूर कर देता है, जिससे फिर आंतरिक व बाह्य शांति की स्थापना में योगदान मिलता है। सभी प्रतिभागियों ने यह प्रण लिया कि वे ध्यान को अपनी दिनचर्या का अंग बनायेंगे, तथा जहाँ भी जायेंगे वहाँ प्रेम, एकता, और शांति के संदेश का प्रचार-प्रसार करेंगे।

 

सम्मेलन के समापन समारोह में भारत के कोने-कोने से और विश्व के विभिन्न देशों से हज़ारों आध्यात्मिक जिज्ञासुओं ने भाग लिया।

धर्मवीर भक्कू

पब्लिक रिलेशन ऑफिसर