कौन जानें महिलाओं की पीड़ पराई ??? असिड अटैक

इतने हादसे होने के बाद भी खुलेआम बिकता है तेजाब! दिल्ली जैसे बड़े शहर भी अछुते नहीं है। क्या किसी को भी इन महिलाओं की पीड़ा का आभास नही होता है? कितना दर्द है उनकी आंखों में। उनमें से एक महिला ने अपना दर्द कुछ पक्तियों द्वारा व्यक्त किया है....

 “फेंक दिया
सो फेंक दिया
अब कसूर भी बता दो मेरा
तुम्हारा इजहार था
मेरा इन्कार था
बस इतनी सी बात पर
फूंक दिया तुमने
चेहरा मेरा…

गलती शायद मेरी थी
प्यार तुम्हारा देख न सकी
इतना पाक प्यार था
कि उसको मैं समझ ना सकी….

अब अपनी गलती मानती हूँ
क्या अब तुम …?
अपना ओगे मुझको..?
क्या अब अपना … बनाओगे मुझको..?
क्या अब … सहलाओगे मेरे चहरे को..?

जिन पर अब फफोले हैं…

मेरी आंखों में आंखें डालकर देखोगे..?
जो अब अन्दर धस चुकी हैं

जिनकी पलकें सारी जल चुकी हैं
चलाओगे अपनी उंगलियाँ मेरे गालों पर..?

जिन पर पड़े छालों से अब पानी निकलता है
हाँ, शायद तुम कर लोगे….

तुम्हारा प्यार तो सच्चा है ना..?
अच्छा! एक बात तो बताओ
ये ख्याल ‘तेजाब’ का कहाँ से आया..?
क्या किसी ने तुम्हें बताया..?
या जेहन में तुम्हारे खुद ही आया..?
अब कैसा महसूस करते हो तुम मुझे जलाकर..?
गौरान्वित..???
या पहले से ज्यादा
और भी मर्दाना…???

 

एक तेज़ाब का शिकार महिला के दर्द के आगे, महिलाओं पर अत्याचार, महिलाओं का शोषण, महिलाओं का क़त्ले आम ये सब बहुत कमतर और छोटे से अलफ़ाज़ नज़र आते हैं। महिलाओं को जिस्मानी और दीमागी तकलीफें देना कुंठित  पुरुषवादी सभ्यता के लिए कोई यह नया बात नहीं हैं

पुरुषवादी मानसिकता ने हज़ारों सालों तक महिलाओं का मन मुताबिक इस्तेमाल किया और जब मन भर गया तो किसी बेकार सी वस्तु समझकर अपने जीवन से निकालने के लाखों तरीकों को भी ईजाद कर लिया! हजारों साल के शोषण के शोषण के बाद 18वीं सदी के आते-आते दूर कहीं दूसरे देशों में महिलाओं की आज़ादी की आवाजें बुलंद होना शुरू हुईं। 19वीं और 20वीं शताब्दी ने महिलाओं के हकों की लड़ाई को और रफ़्तार दी और 21वीं सदी के आते-आते महिलाओं के लिए किताबों और अदालतों  में बहुत कुछ बदला पर नहीं बदली तो लाखों साल पुरानी कुंठित सभ्यता की विचारधारा! इन तीन सौ सालों में जहां महिलाएं अपने हक़ के लिए,  अपने वजूद के लिए लड़ाई लड़ रही थीं और सफलता अर्जित कर रहीं थी तो वहीं ये कुंठित मानसिकता से ग्रस्त पुरुषवादी सभ्यता, महिलाओं को तकलीफ देने का नया हथियार खोजती रही। ये कुंठित सभ्यता उस हथियार की तलाश में थी जो बहुत आसानी से उपलब्ध तो हो ही साथ में उसकी चोट इतनी घातक हो की पीड़ित महिला की आत्मा तक हिल जाए तथा क़ानून में कोई भी ऐसी धारा न हो जो इस हथियार के इस्तेमाल पर कोई बड़ी सज़ा का प्रावधान रखती हो। शायद इस कुंठित सभ्यता ने बहुत सोच-विचार कर महिलाओं पर अत्याचार के लिए तेज़ाब को चुना होगा।

क़ानून बनाने वालों ने कभी नहीं सोचा होगा कि कभी इंसानी समाज में ऐसा वक़्त भी आएगा कि कोई मर्द इतना ज़्यादा कुंठित भावना से ग्रस्त हो जाएगा कि महिलाओं पर एसिड अटैक भी करेगा।     

आज आपको हर रोज़ अखबार, खबरिया चैनल, न्यूज़ पोर्टल, सोशल मीडिया आदि पर एसिड अटैक की तमाम खबरें पढ़ने और देखने को मिल जाएंगी। एसिड अटैक पीड़ित पर दुनिया भर की चर्चा और सेमिनार भी देखने सुनने को मिल जाएंगे पर ये चर्चा किसी नतीजे पर पहुंचे बिना ही समाप्त हो जाती हैं। 

एसिड अटैक विक्टिम पर लिखकर, टीवी प्रोग्राम करके सिर्फ टीआरपी और स्पोंसरशिप बढ़ाने के अलावा कुछ नहीं किया है, क्योंकि अगले दिन फिर एसिड अटैक विक्टिम महिला कहीं अपना इलाज कराने के   लिए जूझ रही होती हैं, कहीं कोई महिला एक और एसिड अटैक का शिकार बन रही होती है तो कहीं एसिड हमले का शिकार होकर दुनिया को अलविदा कह रही होती है। 

न्यायपालिका भी कुछ आदेश लाकर और सरकार लाखों कमेटियों की तरह एक और कमेटी बनाकर सुकून की सांस लेती है और फिर एक बार अपने रूटीन ढर्रे पर लौट आती हैं। सामाजिक कार्यकर्ता दो चार लेख, एक दो जंतर-मंतर पर धरने प्रदर्शन और टीवी की चर्चा में शामिल होकर अपने घर आकर चैन से सो जाते हैं और देश में कहीं कोई महिला फिर एक और एसिड अटैक का शिकार बन रही होती हैं। 

आज इस एसिड अटैक की वजह से बहुत सारी लड़कियों और महिलाओं की जान जा चुकी है, लड़कियों और महिलाओं कि ज़िंदगी बर्बाद हो चुकी है, बहुत सारी लड़कियां और महिलाएं आज बद से बदतर हालात में अपना जीवन यापन करने को मजबूर हैं। अब समय आ गया है कि एसिड अटैक पर न्यायपालिका के साथ-साथ सरकार को ऐसे कुछ सख्त क़ानून बनाने चाहिए जो इस देश के साथ साथ दुनिया के लिए एक ट्रेंड सेटर साबित हो साथ ही ऐसा कोई कानूनी प्रावधान भी होना चाहिए जिसमें एसिड हमलों की शिकार महिला को सभी तरह की सुरक्षा और सुविधाएं सुनिश्चित हो जाएं  जैसे कि पीड़िता को मुफ्त इलाज के साथ साथ सरकारी नौकरी और सामजिक सुरक्षा के लिए 'एसिड अटैक विक्टिम डेवलपमेंट फंड' या फिर 'एसिड अटैक विक्टिम डेवलपमेंट सोसाइटी'   आदि संस्थाओं का गठन भी होना चाहिए ताकि एसिड अटैक की पीड़ित को कहीं से कुछ तो राहत मिल सके।